सोमेश्वर कालिका धाम , प्रकृति की गोद में बसा मनोरम स्थल
बिहार / बगहा
रामनगर । (दिनेश मुखिया, ” स्वतंत्र पत्रकार ” )प्रखंड के उत्तर में भारत -नेपाल सीमा पर अवस्थित सोमेश्वर (शिवालिक श्रेणी) पहाड़ी पर माता कालिका का दरबार अवस्थित है। रामनगर से गोवर्द्धना पहुँचकर नदी मार्ग से जंगल होते हुए पैदल यात्रा करके चौंड़ा माथा, बतास चौंड़ा चोटी, आदि पार करते हुए राजा भ्रतृहरी कुटी/ सोमेश्वर मंदिर पहुंचा जाता है। भ्रतृहरी कुटी पर विश्राम करके डाकबंगला चोटी, सोमेश्वर चोटी पार करके माता कालिका चोटी पर जगज्जननी माता सोमेश्वर वाली काली का दर्शन होता है। गोवर्द्धना से काली मंदिर की दूरी बारह किलोमीटर है। माता के पास नेपाल के भिखना ठोरी या नारायण घाट से माड़ी नगरपालिका के बसंतपुर शहर पहुँचकर वहाँ से बारह किलोमीटर की दूरी तय करके भी चोटी पर पहुँचा जा सकता है। इस रास्ते दस किलोमीटर तक सड़क का निर्माण हो गया है। अब बसंतपुर सोमेश्वर के रास्ते केवल एक किलोमीटर ही पैदल यात्रा करना पड़ता है।

मनोरम दृश्य :- गोवर्द्धना के रास्ते आने पर अद्भुत प्राकृतिक दृश्यों का दर्शन होता है। इस रास्ते पहाड़ की बिल्कुल खड़ी चट्टानों, सोमेश्वर झील, ठंड जलधारा, परेवादह, हाथी गुफा, शकरी गली आदि को देखने के बाद मन को असीम व अद्भुत शांति मिलती है। परेवादह में पौराणिक महत्व के परेवों (कबुतरों) के दर्शन होते हैं।
सच्चे मेहनती सेवकों को सादर प्रणाम :- इस स्थल पर जहाँ केवल अपना शरीर लाना मुश्किल होता है , वहीं चौंड़ा माथा पर्वत पर भ्रतृहरी आश्रम चोटी से जल लाकर जल और चना-मिठा का नि:शुल्क विश्रामाहार देने वाले गोवर्द्धना गाँव के युवाओं व समाजसेवियों के जज्बे को देखते ही बनता है। भर्तृहरि आश्रम में भी नि:शुल्क भंडारा गोवर्द्धना , मनचंगवा एवं अन्य गाँवों द्वारा चलाया जाता है। श्रद्धालुओं हेतु मनचंगवा गाँव, बखरी गाँव, तथा रामनगर के समाजसेवियों द्वारा भी जगह-जगह पर सेवा कार्य किया जाता है।

राजा भ्रतृहरी से जुड़ा स्थल :- यह स्थल श्रृंगार शतक के रचयिता राजा भ्रतृहरी से जुड़ा है। अपनी पत्नी से क्षुब्ध उज्जैन के राजा भ्रतृहरी अपने गुरू गोरक्षनाथ के निदेशानुसार इस स्थान पर सन्यासी जीवन जीने के लिए आये थे। प्रवचनकर्ता संत जयश्री भगत उर्फ जटायु बाबा बताते हैं कि माता कालिका का यह स्थान शक्ति के एक सौ आठ सिद्धपीठों में से एक है। यहाँ माता सती का बायाँ कान गीरा था। जनश्रुति है कि भ्रतृहरी के अनुज विक्रमादित्य अपने भाई को खोजते हुए इस स्थल पर आए थे तथा उनके लिए शिव मंदिर का निर्माण कराये थे। चैत्रनावरात्रि में विक्रमादित्य भी यहाँ माता कालिका की पूजा किए थे। भ्रतृहरी गुफा भी राजा की याद दिलाती है।

यहाँ अंग्रेज भी आये थे :- इस स्थल पर अंग्रेजी हुकूमत के समय अंग्रेज अधिकारी भी आए थे। इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक के पूर्वार्द्ध तक यहां अंग्रेजों का बनवाया हुआ डाकबंगला था। अंग्रेज अभियंता सिली इसी जगह काले बाघ के द्वारा मारा गया था।

भारत-नेपाल सीमारेखा :- सोमेश्वर की चोटी भारत और नेपाल दोनों मित्र राष्ट्रों की सीमा रेखा है। समझौते के मुताबिक चोटी पर से उत्तर की तरफ जहाँ से पानी का बहाव नीचे है, वहाँ से नेपाल तथा दक्षिण की तरफ जहाँ से पानी का बहाव नीचे होता है वहाँ से भारत होता है। सीमांकन के लिए पिलर संख्या चौवालीस एवं पैंतालीस इसी चोटी पर हैं।
पर्यावरण प्रेमी
दिनेश मुखिया
की कलम से
